खाना बनाने के लिए तेल चुनते समय किन बातों का ध्यान रखें?
जब आप बाजार से कुकिंग ऑयल खरीदते हैं, तो कैनोला, कॉर्न (मकई) और वेजिटेबल ऑयल जैसी चीज़ें सस्ती और आसानी से उपलब्ध होने के कारण अक्सर पहली पसंद बन जाती हैं। लेकिन इन तेलों का नियमित और खासकर तेज़ आँच पर इस्तेमाल आपकी सेहत के लिए उतना फायदेमंद नहीं है जितना लगता है। आइए जानें कि क्यों ये तेल लंबे समय में नुकसानदेह हो सकते हैं।
ओमेगा-6 फैटी एसिड की अधिकता
कैनोला, कॉर्न और आम वेजिटेबल ऑयल में प्रायः ओमेगा‑6 फैटी एसिड की मात्रा काफी ज्यादा होती है।
शरीर को थोड़ी मात्रा में ओमेगा‑6 की ज़रूरत होती है, लेकिन पश्चिमी शैली के आहार (Western diet) में यह पहले से ही बहुत अधिक मिलता है।
- ओमेगा‑6 की अधिकता शरीर में ओमेगा‑3 फैटी एसिड के संतुलन को बिगाड़ देती है।
- यह असंतुलन शरीर में सूजन (inflammation) को बढ़ा सकता है।
- लंबे समय तक सूजन बढ़ने का संबंध हृदय रोग, मोटापा और कई अन्य सूजन संबंधी बीमारियों से जोड़ा गया है।
रिफाइंड तेलों की प्रोसेसिंग कैसे नुकसान पहुँचाती है?
कॉर्न, सोया या साधारण वेजिटेबल ऑयल जैसे तेल अक्सर भारी रिफाइनिंग प्रक्रिया से होकर गुजरते हैं:

- इन्हें बहुत अधिक तापमान पर प्रोसेस किया जाता है।
- हेक्सेन जैसे केमिकल सॉल्वेंट्स का उपयोग किया जाता है।
इस प्रक्रिया के परिणाम:
- कच्चे तेल (अनरिफाइंड ऑयल) में मौजूद कई महत्वपूर्ण पोषक तत्व और एंटीऑक्सीडेंट नष्ट हो जाते हैं।
- तेल अधिक प्रोसेस्ड रूप में बदल जाता है, जिसमें प्राकृतिक स्वास्थ्य लाभ कम बचते हैं।
स्मोक पॉइंट, फ्री रैडिकल और जहरीले यौगिक
कई रिफाइंड वेजिटेबल ऑयल का स्मोक पॉइंट बहुत अधिक नहीं होता, यानी वे अपेक्षाकृत कम तापमान पर ही जलने और टूटने लगते हैं। जब तेल अपने स्मोक पॉइंट तक पहुँचता है:
- तेल से फ्री रैडिकल जैसे हानिकारक यौगिक बन सकते हैं।
- एक्रॉलीन (acrolein) नामक विषैला पदार्थ भी बन सकता है, जो आँख, गला और फेफड़ों को प्रभावित कर सकता है।
- भोजन का स्वाद खराब हो जाता है और साथ ही शरीर में हानिकारक कम्पाउंड्स की मात्रा बढ़ सकती है।
तेज़ आँच पर तलने या डीप फ्राइंग में ऐसे तेलों का उपयोग करने पर अस्वास्थ्यकर रसायन अधिक मात्रा में बनने की संभावना रहती है।
ट्रांस फैट: छिपा हुआ खतरा
रिफाइनिंग के दौरान कुछ तेलों में अल्प मात्रा में ट्रांस फैट भी बन सकते हैं। ट्रांस फैट को सबसे हानिकारक वसा माना जाता है:
- यह बुरे कोलेस्ट्रॉल (LDL) को बढ़ाता है।
- अच्छे कोलेस्ट्रॉल (HDL) को कम करता है।
- हृदय रोग, स्ट्रोक और टाइप 2 डायबिटीज़ का जोखिम बढ़ा सकता है।
भले ही मात्रा बहुत कम हो, लेकिन लंबे समय तक लगातार सेवन से ट्रांस फैट भी शरीर पर नकारात्मक असर डाल सकते हैं।
बेहतर और स्वास्थ्यकर तेल के विकल्प
अगर आप स्वस्थ कुकिंग ऑयल चुनना चाहते हैं, तो कम प्रोसेस्ड और उच्च तापमान पर स्थिर रहने वाले विकल्पों पर ध्यान दें:
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एक्स्ट्रा वर्जिन ऑलिव ऑयल (जैतून का तेल)
- एंटीऑक्सीडेंट और मोनोअनसैचुरेटेड फैट से भरपूर।
- कम से मध्यम आँच पर पकाने, हल्का sauté करने और सलाद ड्रेसिंग के लिए अच्छा विकल्प।
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कोकोनट ऑयल (नारियल तेल)
- ऊँचा स्मोक पॉइंट, यानी ज्यादा तापमान पर भी अपेक्षाकृत स्थिर।
- हाई‑हीट कुकिंग और तलने के लिए उपयुक्त, खासकर अगर आप सैचुरेटेड फैट को संतुलित मात्रा में लेते हैं।
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एवोकाडो ऑयल
- बहुत ऊँचा स्मोक पॉइंट, इसलिए डीप फ्राइंग और सीयरिंग जैसे हाई‑हीट कुकिंग तरीकों के लिए बेहतरीन।
- हेल्दी मोनोअनसैचुरेटेड फैट से समृद्ध।
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घी या क्लैरिफाइड बटर
- पारंपरिक भारतीय रसोई का हिस्सा, स्मोक पॉइंट काफी ऊँचा।
- तेज़ आँच पर पकाने के लिए अच्छा विकल्प और खाने में गहरा, समृद्ध स्वाद देता है।
निष्कर्ष: बेहतर तेल, बेहतर सेहत
कैनोला, कॉर्न और वेजिटेबल ऑयल सस्ते और आसानी से मिलने वाले विकल्प ज़रूर हैं, लेकिन इन्हें बार‑बार और खासकर तेज़ आँच पर इस्तेमाल करना आपकी सेहत के लिए जोखिम भरा हो सकता है।
स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए:
- ऐसे तेल चुनें जो कम प्रोसेस्ड हों,
- उच्च तापमान पर अधिक स्थिर रहें,
- और जिनमें एंटीऑक्सीडेंट व हेल्दी फैट अधिक हों।
कुकिंग ऑयल में यह छोटा सा बदलाव सूजन को कम करने, हानिकारक कम्पाउंड्स के संपर्क को घटाने और समग्र स्वास्थ्य को समर्थन देने में मदद कर सकता है। अगली बार जब आप तेल खरीदें या खाना पकाएँ, तो ऐसे तेल चुनें जो आपके स्वाद के साथ‑साथ आपकी सेहत के लिए भी फायदे का सौदा हों।


